मंगलवार, 29 जून 2010

मेरा चिंतन हमेसा बीतरागी रहा, नवीन विषयों को समझने की एक अभिलाषा मन में बना रहता। सत्य को खोजने का हमेशा प्रयाश करते रहा। १३ वर्ष कीअवाष्थ sइ ही सत्य को जानने का प्रयाश करते रहा, किस प्रकार लोग अपने स्व को नहीं पहचानते, सभी का शारीर तो एक जैसा होता है, रक्त मांस मज्जा से भरा होता है, तो फिर इसमे एक दुसरे के प्रति इर्ष्य द्वेष क्यों !क्यों मानवता को भूल गए है। सभी सूफी संत और गुरुओ ने एक मत में स्वीकार है मानव मत्र एक सामान तो ये कट्टरपन क्यों !वास्तव में धर्म तो धारण करने का है, जो जिसको धारण करे लेकिन स्व जागरण का होना आवश्यक है। में जिज्ञाशु था समय मिलने से सत्संग आवश्य करता।

मानव में पेअत्याक्षा और अ प्रत्यक्षा द्वार होते है जिसमे पञ्च ज्ञान इंद्रिय तो पञ्च कर्मेन्द्रिया है। इसी प्रकार के ७ और द्वार होते है, जिसको अघ्यात्मिक भाषा में पड़ाव कह है hai, सभी संतो ने कहा है, अपने सवा को पहचाने बगैर परम मिलन के नहीं हो सकता है। स्वश ही प्राण का आधार होता है। यदि प्राण तत्वा द्वारा स्वाशा का आवश-प्रवाश बंद कर दिया जय तो हमारे ज्ञान और कर्म इंद्रिय कार्य करना बंद कर देगा। और यह देहा को मृत मन लिया जायेगा। जिसका फिर कोई मोल नहीं होता है। जहा हिन्दू धर्मं में दह संश्कर कर समाप्त कर दिया जाता है, तो वही अन्य धर्मं में अपने वंश के अनुरूप दफना दिया जाता है, और मोह वश कुछ दिन बंधू-बांधव और समाज शोक संतिप्त होकर अपने आप में स्थिर हो जाता है,इश्का फिर विशेष चिंतन नहीं रह जाता है। परन्तु कथो उपनिषद में कहा गया है की ,इर्त्यु से अमृतवा तक जाना है, जब अम्रितात्वा तक जाना है तो मृत्यु कहा हो सकती है। और इसके लिए सवा को पहचानने को पहचानने की जरुरत है। और होगा वह प्राण जागरण से,फिर देहा का अभिमान समाप्त हो जाता है।
भगवन श्री कृष्ण योगेश्वर कहलाये , इश्का कारन योग ही तो है, और इसके माध्यम से उस युग के गुरु संदीपन अपने आश्रम में प्राण जागरण जैसे क्रिया संपन्न कराये। और पुरुष से पुरषोत्तम बनाया। उस युग में श्री कृष्ण भी आम मानव की तरह कार्य सम्पादित किया, आश्रम में लकडिया इक्कठे किये, तो कभी घास के बोझ दोए । एक साधारण से असाधारण बनाने में गुरु का ही हाथ होता है। इतिहाश शकशी है की सभी महँ पुरुष के पीछे एक प्रबल संत/गुरु के साथ और हाथ होता है। भगवन रामचंद्र जी द्व्दसः कला प्रदान करने में गुरु का ही हाथ था।
प्राण जागरण जैसे क्रिया और सोदाश कला युक्त होने के कारन ही संपूर्ण भौतिक और अध्यात्मिक का समंजश्य स्थापित कर पाए यह जन सामान्य के लिए समझ की बात नहीं थी, इनका उदहारण है की श्री कृष्ण को उनके परम भक्त बिदुर ने निमंत्रण तब योगेश्वर ने दुसरे दिन का समय दिया लेकिन प्रकृति का परीक्षा और भगवन को अपना सवा जागरण की लीला बिदुर को दिखाना था, इसीलिए रात्रि भर घोर वारिश हुवा और यमुना नदी में बढ़ का उफान आने लगा, बिदुर भी साथ था, आमंत्रण तो प्रभु ब्विकर कर चुके ठेजना भी आवश्यक था, तब प्रभु ने कहा की यदि में जीवन भर ब्रम्हचर्य में रहा है तो नदी के जल २ भाग में विभक्त हो जावे,और वैसे ही हुवा , बिदुर को काफी आश्चर्य हुवा। आश्चर्य एस लिए हुवा की बिदुर रोज महल में पत्रनिवो को देखा करता था , और यहाँ ब्रम्हचर्य का बात हो रहा है,और यह बात सत्य भी सत्य है तभी तो प्रकृति ने प्रभु का बात मन है। एश रहष्य को उन्होंने वह पर व्यक्त नहीं किये और सीधे बिदुर के घर पहुचे वह उनका इंतजार हो रहा था

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